देश की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर मुस्लिम संगठनों का परिसंघ ‘मुशावरत’ का चिंतन

उत्पीड़न के विरुद्ध उत्पीड़ितों की एकता पर ज़ोर, बरेली में हाल ही में हुए दंगों, गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, झारखंड और अन्य राज्यों में मुसलमानों को निशाना बनाए जाने पर आक्रोश,मौलाना तौकीर रज़ा खान की गिरफ़्तारी और बरेली में मुसलमानों के ख़िलाफ़ अनुचित कार्रवाई की निंदा और उनकी तत्काल रिहाई की माँग, लोकतंत्र और क़ानून के शासन दरपेश ख़तरों से लड़ने का संकल्प, अल्पसंख्यकों का अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाने का निर्णय, देश भर से आए सदस्यों और प्रतिनिधियों ने प्रस्तावों पर चर्चा में भाग लिया, सभी प्रस्तावों और बजट की सर्वसम्मति से मंज़ूरी नई दिल्ली: देश और समाज गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है, भारत का लोकतंत्र ख़तरे में है, हर तरफ़ भय और आतंक का माहौल है, जिसका हमें अटूट विश्वास और निडरता के साथ सामना करना होगा। यह विचार ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस ए मुशावरत के अध्यक्ष फिरोज अहमद एडवोकेट ने शनिवार को मुशावरत की कार्यकारी परिषद और आम सभा की संयुक्त बैठक में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमारा सबसे शक्तिशाली हथियार वोट है और स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि अब इसे कमजोर करने और यहां तक कि समाज के कमजोर वर्गों से यह शक्ति छीनने की साजिशें की जा रही हैं। वोट छीनने के लिए एसआईआर का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दबे-कुचले लोगों को एकजुट होने, एक साथ बैठने और मिलकर काम करने की जरूरत है। इसके लिए मुशावरत के अध्यक्ष ने नवंबर के अंत या दिसंबर की शुरुआत में एक अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाने का प्रस्ताव रखा, जबकि मुशावरत के उपाध्यक्ष मौलाना असगर अली इमाम मेहदी सलफी ने कहा कि आज हमारा समाज पहले से कहीं अधिक अव्यवस्थित और अज्ञानी है। हमें पहले अपने युवाओं को प्रशिक्षित करने की जरूरत है, फिर उन्हें आगे बढ़ाने की। पूर्व सांसद सैयद अज़ीज़ पाशा ने कहा कि मुशावरत को कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर जगह मज़बूत और सक्रिय करने की ज़रूरत है, और पूर्व सांसद कुंवर दानिश अली ने ज़ोर देकर कहा कि मुशावरत पूरी ताकत से और हर स्तर पर सक्रिय किया जाए, और हमें हर कुर्बानी के लिए तैयार रहना चाहिए। प्रोफ़ेसर बसीर अहमद ख़ा ने ज़्यादा से ज़्यादा पार्टियों और हर छोटे-बड़े संगठन के प्रतिनिधियों को शामिल करने पर ज़ोर दिया, तो डॉ. अनवारुल इस्लाम ने कहा कि मुशावरत को संगठनात्मक मुद्दों और मतभेदों से आगे बढ़कर अपने मूल लक्ष्य और घोषणा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। श्री हारून रशीद (मुर्शिदाबाद), मोहम्मद अहमद मोमिन (औरंगाबाद), अब्दुल कय्यूम ख़ान (श्रीनगर) और प्रोफ़ेसर अक़ील अली सैयद (गुजरात) ने मुशावरत को ज़मीनी स्तर पर सक्रिय बनाने का प्रस्ताव रखा, जबकि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सचिव श्री मुहम्मद आसिफ ने सुझाव दिया कि मुशावरत को राजनीतिक दलों से भी मिलना चाहिए और उनके नेताओं को चर्चा के लिए आमंत्रित करना चाहिए। मुस्लिम संगठनों के परिसंघ, आल इंडिया मुस्लिम मजलिसे-मुशावरत के इस अधिवेशन ने दर्जन भर से अधिक प्रस्तावों को स्वीकृति दी। जिनमें सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति की निंदा, उत्पीड़ितों की एकता पर ज़ोर, बरेली में हुई हिंसा पर चिंता, गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, झारखंड और अन्य भाजपा शासित राज्यों में सरकारी मशीनरी द्वारा मुसलमानों को निशाना बनाए जाने पर चिंता व्यक्त की गई और पीड़ितों को उनके नुकसान की भरपाई की माँग की गई। मुशावरत ने इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना ताक़ीर रज़ा ख़ान की नज़रबंदी की निंदा की और उनकी आवाजाही पर लगे सभी प्रतिबंध हटाने की माँग की। बैठक में असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और देश के विभिन्न हिस्सों में मदरसों और मस्जिदों को अवैध रूप से ध्वस्त करने और मुसलमानों पर बुलडोज़र चलाने को संविधान और क़ानून का उल्लंघन बताया गया और इसी तरह, कानपुर और बरेली में “आई लव मुहम्मद” पोस्टर को लेकर पुलिस की अनुचित कार्रवाई को बेहद निंदनीय और असहनीय बताया गया। ये प्रस्ताव मुशावरत के उपाध्यक्ष नवीद हामिद और महासचिव शेख मंजूर अहमद ने पेश किए, जबकि पूर्व राजदूत और मुशावरत के सदस्य ज़िक्र-उर-रहमान ने अंतरराष्ट्रीय मामलों पर एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें फ़िलिस्तीनी मुद्दे पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। बैठक में सर्वसम्मति से इज़राइली आक्रमण की निंदा की गई और कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र के 197 सदस्य देशों में से 157 द्वारा फ़िलिस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देना आशा की किरण है। बैठक में कहा गया कि हम फ़िलिस्तीन के उत्पीड़ित लोगों के साथ खड़े हैं। सभा की शुरुआत मौलाना अज़हर मदनी द्वारा पवित्र कुरान की आयतों के पाठ से हुई। अध्यक्ष के उद्घाटन भाषण के बाद, मौलाना डॉ. शीश मुहम्मद इदरीस तैमी ने समुदाय के दिवंगत सदस्यों के लिए शोक प्रस्ताव पेश किया और उपस्थित लोगों ने उन के लिए दुआ की। महासचिव (वित्त), श्री अहमद रजा ने 2025-26 का बजट प्रस्तुत किया, जिसे बैठक में सर्वसम्मति से अनुमोदित किया गया, जबकि महासचिव (मीडिया) श्री अहमद जावेद ने कार्य रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें मुशावरत के पिछले एक वर्ष के प्रदर्शन की समीक्षा की गई, प्रयासों, चुनौतियों को प्रस्तुत किया गया। इसके सामने आने वाली चुनौतियाँ और इसकी प्रगति। रिपोर्ट के अनुसार, मुशावरत ने एक संघ के रूप में अपनी भूमिका बनाए रखी है जिसने विभिन्न मुस्लिम संगठनों, विद्वानों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक साझा मंच प्रदान किया है। सदस्य संगठनों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखा गया ताकि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर एक साझा रुख अपनाया जा सके, और नई संस्थाओं से संपर्क बढ़ाकर उन्हें मुशावरत से जोड़ने के प्रयास भी किए गए। साथ ही, यह भी कहा गया कि सीमित वित्तीय संसाधन मुशावरत की गतिविधियों के विस्तार में एक बाधा हैं। सदस्य संगठनों के बीच बेहतर संबंध और समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता है। इसके लिए अधिक ध्यान और संसाधनों की आवश्यकता है, विशेष रूप से लगातार बदलती राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को देखते हुए, और देश में बढ़ती सांप्रदायिक घृणा, ध्रुवीकरण, हिंसक प्रवृत्तियों और नागरिक स्वतंत्रता में लगातार गिरावट के कारण पहले से कहीं अधिक चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि मुशावरत कुरान के इस निर्देश पर आधारित है कि “नेकी और धर्मपरायणता के कार्यों में एक-दूसरे की मदद करो, और पापों और अपराधों में किसी के सहायक न बनो।” और यह कि “अपने बीच के भूलचूक को माफ़ कर दो, उनके लिए माफ़ी मांगो और उनसे मशविरा करो, फिर जब तुम फ़ैसला कर लो, तो अल्लाह पर भरोसा रखो। निस्संदेह, अल्लाह उन लोगों से प्यार करता है जो उस पर भरोसा करते हैं।” सभा का समापन अध्यक्ष के समापन भाषण और उपाध्यक्ष मौलाना असगर इमाम मेहदी सलफ़ी की दुआ के साथ हुआ। बैठक में भाग लेने वाले अन्य लोगों में, दिल्ली मुशावरत के अध्यक्ष डॉ. इदरीस कुरैशी, महाराष्ट्र मुशावरत के महासचिव श्री मुहम्मद अहमद मोमिन

गरीबी व पलायन को अपराध और सत्ता व धनकी लूट को वैध बनाया जारहा है :मुशावरत

मुस्लिम संगठनों के महासंघ ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस ए मुशावरत ने मताधिकार छीनने की कोशिशों, गैरकानूनी बेदखली और लक्षित हिंसा की घटनाओं को न्याय, लोकतंत्र और मानवाधिकार पर हमला माना और सभी स्तरों पर कानूनी, राजनीतिक और नैतिक प्रतिरोध का संकल्प लिया। नई दिल्ली: ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत (AIMMM), जो भारत के मुस्लिम संगठनों और प्रमुख हस्तियों का महासंघ है, बिहार और देश के अन्य हिस्सों में एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन)के माध्यम से हाशिये पर पड़े समुदायों के मताधिकार छीनने की कोशिशों पर गहरी चिंता और दुख व्यक्त करता है। इसके साथ ही, मुशावरत का मानना है कि भाजपा-शासित राज्यों में, सांप्रदायिक हिंसा, घृणा अपराधों और अल्पसंख्यकों पर लक्षित आतंकवादी कार्रवाइयों में खतरनाक वृद्धि, असम में मुसलमानों को अवैध रूप से उजाड़ना, बांग्ला भाषी मुसलमानों को निशाना बनाना, वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 के दुष्प्रभाव, मालेगांव विस्फोट के आरोपियों की दोषमुक्ति और महाराष्ट्र सरकार द्वारा मालेगांव व मुंबई ट्रेन विस्फोट मामलों में अलग-अलग रुख अपनाना – ये सभी देश के लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए गंभीर खतरा हैं। ये बातें शनिवार को यहां मुशावरत के अध्यक्ष फ़िरोज़ अहमद अधिवक्ता ने मीडिया के प्रतिनिधियों को संभोदित करते हुए कहीं। उन्हों ने इज़रायली सरकार द्वारा गाज़ा, वेस्ट बैंक और अन्य कब्ज़े वाले इलाक़ों में फ़िलिस्तीनी जनता के खिलाफ़ किए जा रहे नरसंहार, युद्ध अपराधों और संगठित अत्याचारों की कड़ी निंदा करती है। मुशावरत के स्थापना दिवस पर जारी किये गए विज्ञप्ति में कहा गया है कि मुशावरतइन सभी संकटों को न्याय, लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर हमला मानती है और हर स्तर पर कानूनी, राजनीतिक व नैतिकप्रतिरोध का संकल्प लेता है। एसआईआर का दुरुपयोग यह प्रक्रिया, जो मतदाता सूची में पारदर्शिता और सटीकता सुनिश्चित करने के लिए है, हाशिये पर पड़े समुदायों—विशेष रूप से मुसलमान, दलित, पिछड़े और गरीब तबके—को निशाना बनाने और उनके नाम मनमाने ढंग से हटाने का हथियार बन गई है। रिपोर्टों के अनुसार, बिना सत्यापन या सूचना के बड़े पैमाने पर नाम काटे जा रहे हैं और दस्तावेज़ी सबूत स्वीकारकरने से इनकार किया जा रहा है। मुशावरतका कहना है कि यह मताधिकार पर सीधा हमला है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए। बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा और लक्षित कार्रवाइयाँ हाल के महीनों में सांप्रदायिक हमलों, अवैध विध्वंस और धार्मिक रूप से प्रेरित आतंकवादी कार्रवाइयों में खतरनाक वृद्धि हुई है। कुछ मीडिया संस्थान घृणा फैलाने वाला प्रचार कर रहे हैं, राजनीतिक संरक्षण अपराधियों को बचा रहा है और न्याय में देरी जनता का विश्वास कम कर रही है। असम में विशेष रूप से बांग्ला भाषी मुसलमानों को उजाड़ने की मुहिम, और दिल्ली एनसीआर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश में उन पर “अवैध प्रवासी” होने का आरोप लगाकर परेशान करना, एक संगठित भेदभावपूर्ण नीति का हिस्सा है। मुशावरतमांग करती है कि सभी बेदखली मुहिम रोकी जाए, नागरिकता और भूमि रिकार्ड का पारदर्शी परीक्षण हो, औरजातीय व धार्मिक भेदभाव से बचाने के लिए ठोस कानूनी सुरक्षा दी जाए। वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 यह कानून वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और सुरक्षा को बेहतर बनाने के बजाय उनकी स्वायत्तता और संवैधानिक संरक्षण को खतरे में डालता है। सरकार को अत्यधिक नियंत्रण देकर, राजनीतिक हस्तक्षेप और भूमि अधिग्रहण के रास्ते खोलता है। भाजपा शासित राज्यों में इसका दुरुपयोग किया जा रहा है,  जबकि यह कानून अभी सर्वोच्च न्यायालय में समीक्षाधीन है।मुशावरत इसकी तत्काल वापसी की मांग करती है। मालेगांव विस्फोट मामला मालेगांव विस्फोट 2008के सभी आरोपियों की दोषमुक्ति, जिसमें 6 लोगों की मौत और सौ से अधिक घायल हुए, न्याय की विफलता है। महाराष्ट्र सरकार का रवैया मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले से भिन्न रहा, जो दोहरे मानदंड को दर्शाता है। मुशावरतउच्चस्तरीय न्यायिक जांच और समान न्याय मानकों की मांग करता है। फ़िलिस्तीन में नरसंहार इज़रायल की कार्रवाइयाँ, जिनमें नागरिकों पर बमबारी, नाकाबंदी, भूखमरी और जबरन विस्थापन शामिल हैं, खुला नरसंहार हैं। मुशावरतअंतरराष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय से तत्कालहस्तक्षेप और इज़रायल के खिलाफ जवाबदेही तय करने की मांग और क्षेत्र के देशों को मानवता के साथ खड़े होने तथा उत्पीड़न और नरसंहार को कभी बर्दाश्त न करने का आग्रह करती है।

मुशावरत ने अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच संघर्ष विराम का स्वागत किया,

विश्व शांति को दरपेश खतरे पर गहरी चिंता जताई और फ़िलस्तीन में जारी युद्ध अपराधों की निंदा की नई दिल्ली : ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत, जो भारत के प्रमुख मुस्लिम संगठनों का महासंघ है, अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच घोषित संघर्षविराम का स्वागत करती है। यह युद्धविराम पश्चिम एशिया में और अधिक तबाही व तनाव से बचाव के लिए एक सकारात्मक और आवश्यक कदम है। मुशावरत के अध्यक्ष श्री फ़िरोज़ अहमद एडोकेट ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए कहा है कि ईरान पर के हमले एक संप्रभु देश पर अवांछित आक्रमण और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प ने हमले औरआक्रामकता से विश्व व्यवस्था और क्षेत्र की शांति के लिए गंभीर खतरे पैदा कर दिए हैं। जबकि मुशावरत फ़िलस्तीन में इजरायली सेना द्वारा की जा रही निरंतर कार्रवाई, नागरिकों की मौत, और व्यापक मानवीय संकट को लेकर गहरी पीड़ा और कड़ी निंदा व्यक्त करती है। अस्पतालों, स्कूलों, पत्रकारों और राहतकर्मियों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय क़ानून का गंभीर उल्लंघन है और युद्ध अपराध है। मुशावरत को इस बात पर भी गहरी चिंता है कि अमेरिका जैसी ताक़तवर वैश्विक शक्तियाँ इज़राइल को निरंतर समर्थन देकर उसके अत्याचारों को बढ़ावा दे रही हैं। फ़िलस्तीनियों पर दशकों से थोपे गए अन्याय, घेराबंदी, जबरन बेदखली और मूल अधिकारों से वंचित किए जाने की नीति अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक गंभीर चुनौती है।  मुशावरत  अंतरराष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक नागरिक समाज से मांग करती है कि वे: मुशावरत फ़िलस्तीन के पीड़ितों के साथ एकजुटता व्यक्त करती है और दुनिया भर में न्याय, मानव गरिमा और स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठा रहे सभी लोगों के साथ खड़ी है।

डॉ अली महमूदाबाद की गिरफ्तारी की मुशावरत द्वारा कड़ी निंदा

एक प्रतिष्ठित विद्वान, राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर, भारत के मुस्लिम संगठनों और प्रमुख व्यक्तियों के परिसंघ मुशावरत के माननीय सदस्य और प्रतिष्ठित विश्लेषक डॉ. अली महमूदाबाद पर देशद्रोह का आरोप लोकतसंत्र की आत्मा पर हमला है नई दिल्ली: ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत (AIMMM) ने डॉ. अली महमूदाबाद के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और उनकी गिरफ्तारी पर गहरी चिंता और कड़ी निंदा व्यक्त की है। उन पर कथित रूप से “देश-विरोधी” टिप्पणियां करने का आरोप दुर्भाग्यपूर्ण है। मुशावरत ने अपने बयान में कहा कि डॉ. महमूदाबाद एक सम्मानित अकादमिक और बुद्धिजीवी हैं, जो राजनीतिक चिंतन और लोकतांत्रिक विमर्श में अपनी विद्वत्तापूर्ण भागीदारी के लिए जाने जाते हैं। असहमति के विचारों या आलोचनात्मक अकादमिक विश्लेषण को “देश-विरोधी” कहना एक खतरनाक प्रवृत्ति है जो हमारे संविधान में निहित लोकतंत्र, शैक्षणिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे मौलिक सिद्धांतों को खतरे में डालती है। किसी विद्वान को उनके अकादमिक या सार्वजनिक वक्तव्यों के लिए गिरफ्तार करना न केवल बौद्धिक स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि यह विचारों को अपराध घोषित करने की खतरनाक मिसाल है। यह हमारे समाज में आलोचनात्मक संवाद और विभिन्न दृष्टिकोणों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता को दर्शाता है। मुशावरत के अध्यक्ष श्री फ़िरोज़ अहमद एडवोकेट ने प्रशासन से अपील की है कि वे डॉ. अली पर लगाए गए आरोपों को तुरंत वापस लें, उन्हें अविलंब रिहा करें, और उनकी सुरक्षा व गरिमा सुनिश्चित करें। मुशावरत नागरिक समाज, शैक्षणिक संस्थानों और सभी न्यायप्रिय नागरिकों से अपील करती हैं कि वे डॉ. अली के साथ एकजुटता प्रकट करें और आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने के लिए क़ानून के दुरुपयोग का विरोध करें। भारत की ताक़त उसकी बहुलता, वैचारिक विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों में निहित है। बलपूर्वक या धमकी देकर इन सिद्धांतों को कुचलना लोकतंत्र की आत्मा को आघात पहुँचाना है।

मशावरत के पूर्व अध्यक्ष नवेद हामिद “क़ायद-ए-मिल्लत पुरस्कार” से सम्मानित

प्रो۔ विपिन कुमार त्रिपाठी और जॉन दयाल को भी सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा के लिए सम्मानित किया गया  नई दिल्ली: दक्षिण भारत के प्रतिष्ठित संस्थान, क़ायद-ए-मिल्लत एजुकेशनल एंड सोशल ट्रस्ट (चेन्नई) ने शनिवार को आयोजित एक भव्य समारोह में ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मशावरत के पूर्व अध्यक्ष और मूवमेंट फॉर एम्पावरमेंट ऑफ़ इंडियन मुस्लिम्स के महासचिव नावेद हामिद, प्रसिद्ध  मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉन दयाल, तथा सद्भावना मिशन के संस्थापक, प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. विपिन कुमार त्रिपाठी को मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व जज, जस्टिस के.एन. बाशा के हाथों “क़ायद-ए-मिल्लत पुरस्कार” से सम्मानित किया। जनजीवन में सत्यनिष्ठा के लिए दिया जाने वाला यह वार्षिक पुरस्कार एक प्रशस्ति पत्र, पाँच लाख रुपये और सम्मान चिन्ह व शाल पर आधारित है।इस अवसर पर जस्टिस बाशा ने पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं को बधाई देते हुए कहा कि ऐसे महान व्यक्तित्वों को सम्मानित करने का अवसर पाकर वे स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं, क्योंकि ये वे लोग हैं जो अंधकारमय वातावरण में प्रकाशस्तंभ का कार्य करते हैं। ट्रस्ट के महासचिव श्री एम जी दाऊद मियाखान ने कहा, “पुरस्कार विजेताओं को भारत में राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन में ईमानदारी के उनके बेदाग ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर दिया जाता है।” जबकि पूर्व बिशप डॉ वी देवसागयाम ने कहा कि “हम आपकी सेवाओं को सम्मान देने, आपकी पहल का समर्थन करने और यह कामना करने के लिए यहां हैं कि आप सभी बाधाओं के बावजूद अपनी लड़ाई जारी रखें।समारोह की अध्यक्षता क़ायद-ए-मिल्लत ट्रस्ट के अध्यक्ष क़ाज़ी डॉ. सलाहुद्दीन मोहम्मद अय्यूब ने की, जबकि पुरस्कार की घोषणा और विजेताओं का परिचय ट्रस्ट के महासचिव एम.जी. दाऊद मियाँख़ान ने किया। इस अवसर पर मद्रास विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. एस. सादिक और चर्च ऑफ़ साउथ इंडिया के बिशप डॉ.  देवसगायम का भी सम्मान किया गया। ट्रस्ट के महासचिव दाऊद मियाँ ख़ान, कोषाध्यक्ष एस. मुश्ताक़ अहमद और क़ायद-ए-मिल्लत कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एम.ए. तवाब ने महानुभावों को प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह और शॉल भेंट किए।2024 के “क़ायद-ए-मिल्लत पुरस्कार” की घोषणा फरवरी 2025 में की गई थी। पुरस्कार चयन समिति में डॉ. वसंती देवी (पूर्व कुलपति), डॉ. देवसगायम (पूर्व बिशप), श्री पनीरसेल्वम (रीडर्स एडिटर, द हिंदू) और दाऊद मियाँख़ान (महासचिव, क़ायद-ए-मिल्लत ट्रस्ट) शामिल थे।इससे पूर्व ट्रस्ट ने यह पुरस्कार जिन प्रमुख हस्तियों को प्रदान किया है, उन में तीस्ता सीतलवाड़,  और नीलाकणु (2015), एन. शंकरैया और सैयद शाहाबुद्दीन (2016), माणिक सरकार और मोहम्मद इस्माइल (2017), भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति डॉ. हामिद अंसारी और अरुणा रॉय (2018), ए.जी. नूरानी और थिरु मावलावन (2019), हर्ष मंदर और बिल्कीस बानो (2020), डॉ. इरफ़ान हबीब और संयुक्त किसान मोर्चा (2021), थिरु वी रामणी और द वायर न्यूज़ पोर्टल (2022), एन. राम (द हिंदू) और डॉ. अबू सालेह शरीफ़ शामिल हैं।यह पुरस्कार क़ायद-ए-मिल्लत मौलवी मोहम्मद इस्माइल की स्मृति में प्रदान किया जाता है, जो देश और समुदाय के निःस्वार्थ सेवक, स्वतंत्रता सेनानी और देश के प्रतिष्ठित नेता थे। भारत की आज़ादी के बाद देश और समुदाय के निर्माण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे संविधान सभा के सदस्य, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य, और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के संस्थापक नेता थे। वे ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मशावरत के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल थे।क़ायद-ए-मिल्लत ट्रस्ट ने मौलवी मोहम्मद इस्माइल की चालीसवीं पुण्यतिथि पर इस पुरस्कार की स्थापना की थी, जिसे प्रत्येक वर्ष सार्वजनिक जीवन में सक्रिय प्रतिष्ठित व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है।

पहलगाम की आतंकवादी घटना की निंदा

यह मानवता के दुश्मनों की करतूत है। मासूम सैलानियों के हत्यारे न तो कश्मीर के हितैषी हो सकते हैं और न ही मुसलमानों के। इस्लाम में आतंकवाद की कोई जगह नहीं है: ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत नई दिल्ली : पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा मासूम सैलानियों की हत्या एक घिनौना और निंदनीय कृत्य है, जिसकी बिना किसी शर्त के कड़ी निंदा की जानी चाहिए। बेगुनाहों के हत्यारे न तो कश्मीर के दोस्त हो सकते हैं और न ही मुसलमानों के। जिसने भी यह बर्बर कार्रवाई की है, वह कश्मीर और इस्लाम दोनों का दुश्मन है। यह बातें मंगलवार को मुस्लिम संगठनों के महासंघ ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत के अध्यक्ष फिरोज़ अहमद एडवोकेट ने पहलगाम में 28 सैलानियों की निर्मम हत्या के संदर्भ में कहीं। उन्होंने कहा कि इस्लाम में आतंकवाद की कोई जगह नहीं है, और क़ुरआन ने एक बेगुनाह की हत्या को समस्त मानवता की हत्या के समान बताया है। उन्होंने इस घटना की तत्काल जांच कर आवश्यक कार्रवाई की मांग की। कहा कि शांति के दुश्मनों को समाज को बांटने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए। हमें अपने देश और एकता पर हुए इस हमले के खिलाफ एकजुट होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो लोग यह अफवाह फैला रहे हैं कि हमलावर धर्म और नाम पूछकर हत्या कर रहे थे, उनके खिलाफ भी जांच और कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हमलावर जंगल से अंधाधुंध गोलीबारी कर रहे थे। मशावरत के अध्यक्ष ने कहा कि हम धर्म के आधार पर अपराध को देश और समाज की शांति के लिए घातक मानते हैं। मीडिया को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि जहाँ आतंकवादियों ने निर्मम हत्याएं कीं, वहीं आम कश्मीरी जनता ने इस आतंकवादी कार्रवाई से नफरत और विरोध प्रकट किया। मस्जिदों से इस कृत्य की निंदा की जा रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आम कश्मीरी मुसलमान कश्मीर में शांति और सद्भाव चाहता है और उसके दिल में मानवीय संवेदना और भाईचारे की भावना जीवित है। मशावरत ने कहा कि इस दुखद घटना को धार्मिक रंग देना गलत और गुमराहकुन है। मृतकों में केवल गैर-मुस्लिम ही नहीं, बल्कि मुसलमान भी शामिल है। घटनास्थल से प्राप्त खबरों के अनुसार हमलों के दौरान स्थानीय लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर कई सैलानियों की जान बचाई और घायलों को अस्पताल पहुंचाया। हमले के बाद देर तक कोई सरकारी सहायता नहीं पहुंची, और घायलों को अस्पताल ले जाने के लिए वहां कोई वाहन भी मौजूद नहीं था। ऐसे समय में स्थानीय लोग अपने घरों से निकलकर आगे आए और जिन लोगों पर हमला हुआ था, उनकी जान बचाई और अपनी जान की परवाह किए बिना उन्हें नजदीकी अस्पताल तक पहुंचाया।

लोकसभा से वक़्फ़ संशोधन विधेयक पारित होने पर मुशावरत का असन्तोष

बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियाँ न्याय के तक़ाज़ों और संविधान की भावना का उल्लंघन कर रही हैं: फ़िरोज़ अहमद एडवोकेट नई दिल्ली: ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत ने लोकसभा में वक़्फ़ संशोधन विधेयक 2024 के पारित होने पर गहरा असन्तोष व्यक्त किया है और कहा है कि बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियाँ न्याय के सिद्धांतों और देश के संविधान व क़ानून की आत्मा को रौंद रही हैं।  मजलिस-ए-मुशावरत के अध्यक्ष, एडवोकेट फ़िरोज़ अहमद ने कहा कि यह विधेयक संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और संविधान के मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 14, 25 और 26 का उल्लंघन करता है। उन्होंने आगे कहा कि यह विधेयक वक़्फ़ की स्वायत्तता और उसके प्रबंधन में सीधा हस्तक्षेप है। विशेष रूप से, वक़्फ़ बोर्ड में सदस्य के लिए मुस्लिम होने की अनिवार्यता को हटाना और दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की अनिवार्य भागीदारी को लागू करना, वास्तव में मुस्लिम समुदाय से उनके धार्मिक और परोपकारी संस्थानों को संचालित करने का अधिकार छीनने के समान है। इसी तरह, वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में शरीयत के जानकार की अनिवार्यता को समाप्त करना अत्यंत सांप्रदायिक कदम है, जिससे गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होंगी।  ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत ने देश के न्यायप्रिय नागरिकों से अपील की है कि वे इन संशोधनों को लागू होने से रोकने के लिए हर संभव कदम उठाएँ, क्योंकि इनके सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभाव और वक़्फ़ संपत्तियों पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट और गंभीर हैं।  मजलिस-ए-मुशावरत के अध्यक्ष ने यह भी कहा कि संगठन अपनी सदस्य इकाइयों, अन्य मुस्लिम संगठनों और धर्मनिरपेक्ष दलों और नेताओं के साथ मिलकर वक़्फ़ संपत्तियों पर मंडरा रहे खतरों के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी ने संसद का उपयोग अपने झूठे और भ्रामक प्रचार को फैलाने के लिए किया है और उसका पालतू मीडिया देश में मुसलमानों के खिलाफ सांप्रदायिक माहौल बना रहा है। यदि इसे नहीं रोका गया, तो यह देश को गंभीर नुकसान पहुँचाएगा। उन्होंने कहा कि बीजेपी मुस्लिम समुदाय को गुमराह करने और आपसी फूट डालने की साजिश कर रही है, यह झूठा प्रचार कर रही है कि यह विधेयक मुस्लिम समाज के पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए लाया गया है। उन्होंने जनता दल (यूनाइटेड), तेलुगु देशम पार्टी और बीजेपी की अन्य सहयोगी पार्टियों को चेतावनी दी है कि इस विवादास्पद और सांप्रदायिक आधार पर लाए गए विधेयक का समर्थन करना उन्हें भारी कीमत चुकाने पर मजबूर करेगा।

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