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मुशावरत के अध्यक्ष श्री फ़िरोज़ अहमद ने कहा “अल्पसंख्यकों को अवांछित कानूनी लड़ाई में घसीटकर देश और समाज को अपूरणीय क्षति पहुंचाना बंद किया जाना चाहिए”

नई दिल्ली: मुस्लिम संगठनों के परिसंघ, ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया है, जिसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के अल्पसंख्यक चरित्र को बरकरार रखा और 1967 के सैयद अजीज बाशा मामले के फैसले को रद्द कर दिया। मुशावरत के अध्यक्ष और वरिष्ट अधिवक्ता, फ़िरोज़ अहमद  ने आशा व्यक्त की है कि देश और समाज का अपूरणीय क्षति रोकने के लिए अल्पसंख्यकों को अवांछित कानूनी लड़ाई में घसीटना बंद होना चाहिए। श्री अहमद ने कहा, “सांप्रदायिक फासीवादी तत्वों को अपना चेहरा आईने में देखना चाहिए।” मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संविधान पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाया है कि संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित संस्थानों के अल्पसंख्यक चरित्र को समाप्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट के पिछले निर्णय और तर्क दोनों को गलत बताया और यह भी निर्देश दिया कि नई पीठ इस पर निर्देश तय करेगी। फैसले के आलोक में अब सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच यह तय करेगी कि क्या एएमयू वाकई अल्पसंख्यक संस्थान है।मुशावरत ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि इस मुद्दे को जल्द से जल्द निबटाया जाए, कानून की इस अनावश्यक लङाई को रोका जाए जिसमें दशकों से हमारी बहुमूल्य ऊर्जा बर्बाद हो रही है। मुशावरत इस पर जोर देती है कि विस्तृत फैसला आना अभी बाकी है, इसलिए इस लड़ाई को पूरी ताकत और रणनीति के साथ शीर्ष अदालत में अंजाम तक ले जाने की जरूरत है।

मुशावरत ने आगे कहा कि देश में सिर्फ धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थान ही नहीं हैं, हिंदू संस्थानों समेत बड़ी संख्या में भाषाई अल्पसंख्यक संस्थान भी काम कर रहे हैं लेकिन मुसलमानों से नफरत और दुश्मनी में लीन तत्वों की आंखों पर पट्टी पङी हुई है। प्रेस के लिए अपने बयान में मुशावरत ने कहा कि यह फैसला न केवल एएमयू बल्कि देश भर के अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने के अधिकार और उनके अल्पसंख्यक चरित्र की सुरक्षा को मजबूत आधार प्रदान किया है, जो भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों में शामिल है।

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